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नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध वाराणसी से क्यों लड़ना चाहते हैं चन्द्रशेखर उर्फ रावण ?

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध वाराणसी संसदीय सीट से भीम आर्मी के प्रमुख चन्द्रशेखर आजाद उर्फ रावण लोकसभा चुनाव क्यों लड़ना चाहते हैं? इसको लेकर राजनीतिक दलों के बीच, विशेषकर दलित वर्ग के राजनेताओं के बीच तरह-तरह की चर्चा शुरू हो गई है।

इनमें कुछ का कहना है कि चन्द्रशेखर देश के सबसे शक्तिशाली सत्ताधारी पार्टी के नेता एवं प्रधानमंत्री के विरुद्ध वाराणसी (काशी) संसदीय सीट से लड़कर देश-विदेश में चर्चित होना चाहते हैं। वह अपने जीवन की पहली चुनावी लड़ाई में ही अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि पाने के लिए यह कर रहे हैं। यह करके वह दलितों के सबसे निडर व क्रांतिकारी युवा नेता बनना चाहते हैं। यह संदेश देना चाहते हैं कि जिस शक्तिशाली सत्ताधारी नेता से डर के मारे उससे सीधे कोई दलित नेता टकराना नहीं चाहता है, उसके विरूद्ध वह (चन्द्रशेखर) चुनाव लड़ने की हिम्मत कर रहे हैं। वह वाराणसी से प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध लोकसभा चुनाव लड़कर दलितों, विशेषकर युवा दलितों और मुस्लिमों में यह संदेश देने में कामयाब हो जायेंगे।

यह होते ही वह दलितों की सबसे बड़ी नेता बसपा प्रमुख मायावती के वोट बैंक को काटेंगे, जिसके चलते उ.प्र. में दलितों का यह मायावती के बाद दूसरे नंबर के नेता और दलित युवकों का सबसे चहेता नेता हो सकते हैं। जहां तक वाराणसी संसदीय सीट का सवाल है, यहां से 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी नरेन्द्र दामोदर दास मोदी को 5,81,022 वोट मिले थे। दूसरे नंबर पर आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल को 2,09,238 वोट तथा तीसरे नम्बर पर कांग्रेस के अजय राय को 75,614 वोट मिले थे। बसपा प्रत्याशी विजय प्रकाश जायसवाल को 60,579 वोट मिले थे। केन्द्र में 5 वर्ष की सत्ता के बाद स्थित बदली है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को 2019 के लोकसभा चुनाव में मिले वोट से कम वोट मिलेंगे या ज्यादा?

यदि भीम आर्मी के चन्द्रशेखर आजाद उनके विरुद्ध लड़ते हैं, तो वह मोदी को कितना नुकसान पहुंचायेंगे ? इस सवाल पर काशी हिन्दू विश्व विद्यालय (बीएचयू) छात्र संघ के अध्यक्ष रहे कांग्रेस नेता अनिल श्रीवास्तव का कहना है कि वाराणसी में इस लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी का वोट पहले के मुकाबले अबकी कम होगा। कितना कम होगा? यह उसके विरुद्ध कौन दमदार प्रत्याशी है, उसको कौन पार्टी समर्थन कर रही है, इस पर निर्भर करेगा है। यदि भाजपा के प्रत्याशी के विरुद्ध सभी विपक्षी दल मिलकर कोई मजबूत प्रत्याशी खड़ा कर देते हैं, तब तो लड़ाई ठीक हो जायेगी। यदि विपक्षी दल अपने –अपने प्रत्याशी खड़ा करते हैं तब भी भाजपा प्रत्याशी 2014 में मिले वोट के बराबर वोट नहीं पायेंगे। जीत हो सकती है लेकिन 2014 में पाये वोट से कम से। रही बात किसी नये के लड़ने की, तो भाजपा बहुत सी सीटों पर वोट काटने के लिए कुछ लोगों को लड़वा देती है। कुछ लोगों को इसलिए लड़वायेगी ताकि मतों का ध्रुवीकरण हो।

इस बारे में भाजपा किसान मोर्चा के अध्यक्ष व सांसद वीरेन्द्र सिंह का कहना है कि कोई कुछ भी कहे, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वाराणसी संसदीय सीट से इस बार 2014 में पाये वोट से भी अधिक वोट से जीतेंगे। वाराणसी के वरिष्ठ पत्रकार वशिष्ठ का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में कई काम शुरू कराये हैं लेकिन इतना नहीं जो बनारसी जनता को खुश कर सके। इसके बावजूद इस बार भी मोदी ही जीतेंगे, लेकिन 2014 से कम वोट से। रही बात भीम आर्मी पार्टी के चन्द्रशेखर उर्फ रावण की यहां से मोदी के विरुद्ध चुनाव लड़ने की तो वह काशी को पश्चिम उत्तर प्रदेश का जिला मानने की भूल न करें। वह संत रविदास का नाम लेकर काशी से चुनाव लड़ना चाहते हैं लेकिन उनको यह तो पता होगा ही काशी के संत रहे रामानंद की शिष्य परंपरा में कबीर से लेकर तमाम संत किस-किस जाति के हुए थे। सो यहां जाति का वोट उस तरह से नहीं लामबंद हो पाता है, जिस तरह से सामान्य सीट पर आसानी से हो जाता है।

यहां कई बार मुद्दे ज्यादा प्रभावी हो जाते हैं। यहां दलित वोट भी करीब 70 हजार ही है। ऐसे में यदि चन्द्रशेखर आजाद उर्फ रावण वाराणसी संसदीय सीट से बिना किसी पार्टी के समर्थन के चुनाव लड़ते है, तब तो उनको जमानत बचाना भी मुश्किल हो सकता है। काशी में अध्ययनरत अनुसूचित जाति के छात्र छोटे लाल का कहना है कि यहां के दलितों में मायावती का प्रभाव अधिक है लेकिन छात्रों में चन्द्रशेखर आजाद की भी चर्चा शुरू हो गई है। आगे वह क्या करते हैं, इस पर निर्भर करेगा।

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